शादी से पहले लड़की की पहचान उसकी काबिलियत से होती है और शादी के बाद उसकी पहचान
उसके सरनेम से होती है। यदि आप भी कुछ ऐसा ही सोचते है तो आप पूरी तरह से गलत है।
दरअसल भारतीय समाज में शादी के बाद ससुराल को ही लड़की की अंतिम मंजिल माना जाता
है। जबकि वर्तमान में ये बाते बिल्कुल दकियानुसी समझी जाने लगी है। आज शादी के बाद भी
कई लड़कियां अपना सरनेम नहीं बदल रही इसका मतलब ये नहीं है कि यह लड़कियां संस्कारी
नहीं है या फिर इनके पति की इन पर ज्यादा नहीं चलती। एक वक्त था जब शादी के बाद
सरनेम चेंज करना रिवाज माना जाता था। इन दिनों ज्यादातर महिलाएं अपना लास्ट नेम चेंज
नहीं कर रही। यह महिलाएं या तो अपने पति के सरनेम को अपने सरनेम के साथ जोड़ रही हैं
या फिर अपना ही सरनेम शादी के बाद भी यूज कर रही हैं।

एक नई रिसर्च के मुताबिक महिलाओं के ऐसा करने से लोगों का उनके पति के बारे में सोचने का तरीका बदल जाता
है। नेवाडा यूनिवर्सिटी में हुई सेक्स रोल स्टडी में यह जानने की कोशिश की गई कि जिन पुरुषों
की पत्नियों ने उनका सरनेम नहीं लगाया था, लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं।  इस रिपोर्ट में
सामने आया कि ऐसी महिलाओँ को ज्यादा महत्वाकांक्षी, दृढ़ निश्चयी और शक्तिशाली माना
जाता है।

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वैसे पुरानी स्टडिज के मुताबिक’ जब किसी पुरुष की पत्नी उसके सरनेम को अपनाने के चलन
को स्वीकार नहीं करती तो लोग उसके पति को कम मर्दाना समझते हैं। कुछ लोगों के अनुसार
पत्नी के इस फैसले के आधार पर ऐसे पुरुषों को कम पावरफुल माना गया। जबकि आधुनिक
युग में सच्चाई इससे बिल्कुल अगल है। आज महिलाएं कई क्षेत्रों मे पुरुषों से आगे हैं ऐसे में
सिर्फ सरनेम लगा लेने से उनकी काबिलियत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

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